पतंजलि योगदर्शन में चित्त और उसकी 5 वृत्तियाँ

पतंजलि योगदर्शन में चित्त और उसकी 5 वृत्तियाँ

पतंजलि योगदर्शन में चित्त को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। योग की पूरी साधना चित्त को समझने, उसकी वृत्तियों को पहचानने और अंततः उन्हें शांत करने की दिशा में आगे बढ़ती है।

पतंजलि का प्रसिद्ध सूत्र है—

“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।”

अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।

लेकिन चित्त की वृत्तियाँ क्या हैं? और मन, चित्त तथा विचारों का आपस में क्या संबंध है? इसे सरल भाषा में समझते हैं।

चित्त क्या है?

सामान्य भाषा में हम मन को विचार करने, इच्छा करने, याद रखने और निर्णय लेने वाला मानते हैं। योगदर्शन में मानसिक गतिविधियों को अधिक सूक्ष्म रूप से समझाया जाता है।

चित्त वह मानसिक क्षेत्र है जिसमें विभिन्न प्रकार की वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं।

विचार, स्मृति, कल्पना, सही या गलत ज्ञान तथा नींद जैसी अवस्थाएँ चित्त की वृत्तियों के रूप में समझी जाती हैं।

चित्त की पाँच वृत्तियाँ

पतंजलि योगसूत्र में पाँच प्रकार की वृत्तियों का उल्लेख मिलता है—

1. प्रमाण

जब किसी वस्तु के बारे में सही ज्ञान प्राप्त होता है, उसे प्रमाण कहा जाता है।

पतंजलि ने प्रमाण के तीन प्रकार बताए हैं—

  • प्रत्यक्ष
  • अनुमान
  • आगम

अर्थात् सही ज्ञान प्रत्यक्ष अनुभव, तर्कपूर्ण अनुमान या विश्वसनीय प्रमाण से प्राप्त हो सकता है।

2. विपर्यय

जब किसी वस्तु के बारे में गलत ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे विपर्यय कहा जाता है।

उदाहरण के लिए अंधेरे में रस्सी को साँप समझ लेना।

वस्तु वास्तविक रूप से कुछ और है, लेकिन चित्त उसे कुछ और समझ रहा है।

3. विकल्प

जब किसी शब्द या कल्पना के आधार पर मानसिक धारणा बनती है, लेकिन उसके पीछे वास्तविक वस्तु का होना आवश्यक नहीं है, तो उसे विकल्प कहा जाता है।

यह कल्पना और अवधारणा से संबंधित वृत्ति है।

4. निद्रा

पतंजलि ने निद्रा को भी चित्त की एक वृत्ति माना है।

नींद में सामान्य जाग्रत विचारों की गतिविधि नहीं होती, फिर भी एक विशेष प्रकार की मानसिक अवस्था बनी रहती है।

5. स्मृति

पूर्व में अनुभव की गई वस्तु या घटना का चित्त में बने रहना और पुनः प्रकट होना स्मृति है।

हमारे पुराने अनुभव, घटनाएँ और संस्कार स्मृति के रूप में सामने आ सकते हैं।

क्या सभी वृत्तियाँ बुरी हैं?

नहीं।

पतंजलि ने पाँच वृत्तियों का वर्णन किया है। उनका होना अपने-आप में समस्या नहीं है।

योग का उद्देश्य यह समझना है कि चित्त की वृत्तियाँ हमें कैसे प्रभावित करती हैं और उनसे हमारा तादात्म्य कैसे बनता है।

जब व्यक्ति हर विचार को अपना स्वरूप मानने लगता है, तब वह मानसिक उतार-चढ़ाव में उलझ सकता है।

वृत्ति और द्रष्टा

पतंजलि कहते हैं—

“तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।”

अर्थात् जब चित्त की वृत्तियाँ शांत होती हैं, तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित होता है।

इसके विपरीत—

“वृत्तिसारूप्यमितरत्र।”

अर्थात् अन्य समय में द्रष्टा वृत्तियों के साथ तादात्म्य कर लेता है।

उदाहरण के लिए यदि मन में क्रोध का विचार आया और व्यक्ति तुरंत स्वयं को ही “क्रोधित” मानने लगा, तो विचार और देखने वाले के बीच अंतर स्पष्ट नहीं रह जाता।

ध्यान में व्यक्ति धीरे-धीरे यह देखना सीख सकता है—

“क्रोध दिखाई दे रहा है, लेकिन मैं क्रोध को देखने वाला हूँ।”

“विचार आ रहा है, लेकिन मैं विचार को देखने वाला हूँ।”

यह दृष्टि साक्षीभाव की साधना को समझने में सहायक हो सकती है।

चित्तवृत्ति निरोध का अर्थ

चित्तवृत्ति निरोध का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति जबरदस्ती सभी विचारों को दबा दे।

विचारों को दबाने के बजाय साधना का उद्देश्य चित्त की चंचलता को समझना और धीरे-धीरे उसे स्थिर करना है।

पतंजलि कहते हैं—

“अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।”

अर्थात् चित्तवृत्तियों के निरोध के लिए अभ्यास और वैराग्य महत्वपूर्ण हैं।

अभ्यास क्या है?

जब मन बार-बार भटकता है और साधक उसे शांतिपूर्वक वापस अपने ध्यान के विषय पर लाता है, तो यह अभ्यास का एक रूप है।

उदाहरण के लिए—

श्वास पर ध्यान → विचार आया → विचार को देखा → ध्यान फिर श्वास पर।

इस प्रक्रिया को बार-बार करने से एकाग्रता विकसित हो सकती है।

वैराग्य क्या है?

वैराग्य का अर्थ विचारों या संसार से घृणा करना नहीं है।

वैराग्य का अर्थ है अनावश्यक आसक्ति और मानसिक पकड़ का कम होना।

विचार आए तो उसे पकड़कर बैठ जाना आवश्यक नहीं।

विचार को आने और जाने देना भी साधना का हिस्सा हो सकता है।

चित्त शांत होने पर क्या होता है?

जब चित्त अधिक स्थिर होता जाता है, तो साधक अपने विचारों और मानसिक अवस्थाओं को अधिक स्पष्टता से देख सकता है।

धारणा से ध्यान और ध्यान से समाधि की ओर बढ़ने वाली योग-साधना में चित्त की स्थिरता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

पतंजलि योगदर्शन अंततः विवेक और कैवल्य की दिशा में ले जाता है।

पतंजलि योगदर्शन को समझने के लिए चित्त और उसकी वृत्तियों को समझना बहुत आवश्यक है।

प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति—ये चित्त की पाँच प्रमुख वृत्तियाँ हैं।

योग का उद्देश्य इन वृत्तियों से लड़ना नहीं, बल्कि चित्त को समझना, स्थिर करना और द्रष्टा के स्वरूप को पहचानने की दिशा में आगे बढ़ना है।

जब देखने वाला अपनी वृत्तियों से स्वयं को अलग पहचानने लगता है, तब योग की साधना और अधिक गहरी हो सकती है।

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